दुखी व्यक्ति को सब ठगने का प्रयास करते हैं, धर्म के नाम पर बहुत अधिक ठगी हो रही है, हमें हर प्रकार के बंधनों, मत-मतान्तरों, यहाँ तक की धर्म और अधर्म से भी ऊपर उठना ही पड़ेगा, परमात्मा सब प्रकार के बंधनों से परे है, चूँकि हमारा लक्ष्य परमात्मा है तो हमें भी उसी की तरह स्वयं को मुक्त करना होगा, और साधना द्वारा अपने सच्चिदानंद स्वरुप में स्थित होना ही होगा। चिंता और भय ये दोनों ही मस्तिष्क के क्षय रोग हैं जो हमारी क्षमता का तो ह्रास करते ही हैं पर साथ साथ जीवित ही नर्क में भी डाल देते हैं, ये अकाल मृत्यु के कारण भी हैं, परमात्मा में श्रद्धा, विश्वास और निरंतर आतंरिक सत्संग ही हमें इस अकाल मृत्यु सम यन्त्रणा से मुक्त कर सकते हैं। अपनी पीड़ा सिर्फ भगवान को अकेले में कहें, दुनियाँ के आगे रोने से कोई लाभ नहीं है, हम दूसरों की दृष्टि में क्या हैं इसका महत्व नहीं है, महत्व तो इसी बात का है कि हम परमात्मा की दृष्टि में क्या हैं, समष्टि के कल्याण की ही प्रार्थना करें, समष्टि के कल्याण में ही स्वयं का कल्याण है, बीता हुआ समय स्वप्न है जिसे सोचकर ग्लानि ग्रस्त नहीं होना चाहिए। 🙏 "जय जय श्री राधे" 🙏
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