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दुखी व्यक्ति को सब ठगने का प्रयास करते हैं, धर्म के नाम पर बहुत अधिक ठगी हो रही है, हमें हर प्रकार के बंधनों, मत-मतान्तरों, यहाँ तक की धर्म और अधर्म से भी ऊपर उठना ही पड़ेगा, परमात्मा सब प्रकार के बंधनों से परे है, चूँकि हमारा लक्ष्य परमात्मा है तो हमें भी उसी की तरह स्वयं को मुक्त करना होगा, और साधना द्वारा अपने सच्चिदानंद स्वरुप में स्थित होना ही होगा। चिंता और भय ये दोनों ही मस्तिष्क के क्षय रोग हैं जो हमारी क्षमता का तो ह्रास करते ही हैं पर साथ साथ जीवित ही नर्क में भी डाल देते हैं, ये अकाल मृत्यु के कारण भी हैं, परमात्मा में श्रद्धा, विश्वास और निरंतर आतंरिक सत्संग ही हमें इस अकाल मृत्यु सम यन्त्रणा से मुक्त कर सकते हैं। अपनी पीड़ा सिर्फ भगवान को अकेले में कहें, दुनियाँ के आगे रोने से कोई लाभ नहीं है, हम दूसरों की दृष्टि में क्या हैं इसका महत्व नहीं है, महत्व तो इसी बात का है कि हम परमात्मा की दृष्टि में क्या हैं, समष्टि के कल्याण की ही प्रार्थना करें, समष्टि के कल्याण में ही स्वयं का कल्याण है, बीता हुआ समय स्वप्न है जिसे सोचकर ग्लानि ग्रस्त नहीं होना चाहिए। 🙏 "जय जय श्री राधे" 🙏

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**कितनी खूबसूरती से "ईश्वर" आपकी जिन्दगी में हर एक दिन जोड़ते हैं.....**इसलिए नहीं कि आपको उसकी जरूरत है,* *शायद इसलिए कि किसी और को आपकी बहुत ज्यादा जरूरत है.....* *कर पुकार उस प्रभु के आगे,**क्योंकि सब कुछ उसी के बस में होता है। एक मिट्टी की मूर्तियां बनाने वाला कलाकार ईश्वर से कहता है.....*             *"प्रभु तू भी एक कलाकार है और मैं भी एक कलाकार हूँ,*   *तूने मुझ जैसे असंख्य पुतले बनाकर इस धरती पर भेजे हैं,**और मैंने तेरे असंख्य पुतले बना कर इस घरती पर बेचे हैं।* *पर ईश्वर उस समय बड़ी शर्म आती है, जब तेरे बनाये हुए पुतले आपस में लड़ते हैं**और मेरे बनाये हुए  पुतलों के सामने लोग शीश झुकाते हैं"*.

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भाव हो तो कृष्ण सा।।सुदामा सा अभाव हो।।दैन्य और वैभव का।।रंच ना प्रभाव हो।।सुदामा सा लगाव हो।।तो कृष्ण सा स्वभाव हो।।मित्र सदा मित्र रहे।।रंक हो या राव हो।।

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*कौन है अपना, कौन पराया,* *भेद कोई नहीं जाने**मुझको तो सब अपने लगते हैं,* *जो हैं प्रभु प्यारे के दीवाने*

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बरसाने में एक संत किशोरी जी का बहुत भजन करते थे और रोज ऊपर दर्शन करने जाते राधा रानी के महल में। बड़ी निष्ठा, बड़ी श्रद्धा थी किशोरी जी के चरणों में उन संत की।.एक बार उन्होंने देखा की भक्त राधा रानी को बरसाने मन्दिर में पोशाक अर्पित कर रहे थे....तो उन महात्मा जी के मन में भाव आया की मैंने आज तक किशोरी जी को कुछ भी नहीं चढ़ाया...जय श्री राधे! जय श्री कृष्ण!!.और लोग आ रहे है तो कोई फूल चढ़ाता है, कोई भोग लगाता है, कोई पोशाक पहनाता है और मैंने कुछ भी नही दिया, अरे मै कैसा भगत हूँ ?.तो उन महात्मा जी ने उसी दिन निश्चय कर लिया कि मैं अपने हाथों से बनाकर राधा रानी को सुंदर सी एक पोशाक पहनाऊंगा....ये सोचकर उसी दिन से वो महात्मा जी तैयारी में लग गए और बहुत प्यारी सुंदर सी एक पोशाक बनाई,.पोशाक तैयार होने में एक महीना लगा। कपड़ा लेकर आयें, अपने हाथों से गोटा लगाया और बहुत प्यारी पोशाक बनाई।.सूंदर सी पोशाक जब तैयार हो गई तो वो पोशाक अब लेकर ऊपर किशोरी जी के चरणों में अर्पित करने जा रहा थे।.अब बरसाने की तो सीढिया हैं काफी ऊँची तो वो महात्मा जी उपर चढ़कर जा रहे है तो देखियें कैसे कृपा करती है वो हमारी राधा रानी....आधी सीढियों तक ही पहुँचें होंगे महात्मा जी की तभी बरसाने की एक छोटी सी लड़की उस महात्मा जी को बोलती है कि बाबा ये कहाँ ले जा रहे हो आप ? आपके हाथ में ये क्या है ?.वो महात्मा जी बोले की लाली ये मै किशोरी जी के लिए पोशाक बना के उनको पहनाने के लिए ले जारयो हूँ, बृज भाषा में जबाब दिया।.वो लड़की बोली अरे बाबा राधा रानी पे तो बहोत सारी पोशाक हैं, तो तू ये मोकू देदे ना ....तो महात्मा जी बोले कि बेटी तोकू मै दूसरी बाजार से दिलवा दूंगा। ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जारयो हूँ तोकू और दिलवा दूँगो।.लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया ....बाबा ये मोकू देदे पर सन्त भी जिद करने लगे की दूसरी दिलवाऊंगा, ये नहीं दूंगा। लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी... की संत के हाथ से छुड़ाकर पोशाक ले भागी,.अब महात्मा जी बहुत दुखी हो गए, बूढ़े महात्मा जी अब कहाँ ढूंढे उसको, तो वही सीढियो पर बैठकर रोने लगे ....जब कई संत मंदिर से निकले तो पूछा महाराज क्यों रो रहे हो ? तो सारी बात बताई की जैसे-तैसे तो बुढ़ापे में इतना परिश्रम करके ये पोशाक बनाकर लाया राधा रानी को पहनाता पर वासे पहले ही एक छोटी सी लाली लेकर भाग गई तो क्या करु मै अब ?.वो बाकी संत बोले अरे अब गई तो गई कोई बात नहीं अब कब तक रोते रहोगे चलो ऊपर दर्शन कर लो।.रोना बन्द हुआ लेकिन मन ख़राब था क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई तो अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थे ....और मन में ये ही सोच रहे है की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थी , शायद राधा रानी मेरे हाथो से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थी, ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे है।.और अब जाकर अंदर खड़े हुए दर्शन खुलने का समय हुआ और जैसे ही श्री जी का दर्शन खुला, पट खुले तो वो महात्मा क्या देख रहें है कि ....जो पोशाक वो बालिका लेकर भागी थी वो ही पोशाक पहनकर मेरी राधा रानी बैठी हुई है, उसी वस्त्र को धारण करके किशोरी जी बैठी है।.ये देखते ही महात्मा की आँखों से आँसू बहने लगे और महात्मा बोले कि...किशोरी जी मै तो आपको देने ही ला रहा था लेकिन आपसे इतना भी सब्र नहीं हुआ मेरे से छीनकर भागी आप तो।.किशोरी जी ने कहा की बाबा ये केवल वस्त्र नहीं, ये केवल पोशाक नहीं है या में तेरो प्रेम छुपो भयो है और प्रेम को पाने के लिए तो दौड़ना ही पड़ता है, भागना ही पड़ता है।.ऐसी है हमारी राधा रानी प्रेम प्रतिमूर्ति, प्रेम की अद्भुत परिभाषा है।

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"जय" बोलने से मन को शांति मिलती हे , "श्री" बोलने से शक्ति मिलती हे ," राधे" बोलने से पापो सेमुक्ति मिलती हे ....और निरंतर "जयश्री राधे" बोलने से भक्ति मिलती हे , और भक्ति से मेरे कनैया मिलते हे ..................

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*भगवान को भेंट...* पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था। एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! *मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।* भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया। कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा। फिर उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे भी प्रतीत हो रहे हैं। उसने सोचा क्यों ना सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ। उसने उन सभी को उन सौ रुपए में से भोजन की व्यवस्था कर दी। सबको भोजन कराने में उसे कुल 98 रुपए खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा l जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा पैसे चढ़ा दिए। सेठ यह तो नहीं कहेगा 100 रुपए चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दिए मैं बोल दूंगा कि, पैसे चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा। भक्त ने श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं। उसी रात सेठ के पास स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए आशीर्वाद दिया और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ जाग गया सोचने लगा मेरा नौकर तौ बड़ा ईमानदार है, पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी उसने दो रुपए भगवान को कम चढ़ाए ? उसने दो रुपए का क्या खा लिया ? उसे ऐसी क्या जरूरत पड़ी ? ऐसा विचार सेठ करता रहा। काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दिए थे ? भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए। तब भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुरजी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ सारी बात समझ गया व बड़ा खुश हुआ तथा भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला- "आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे श्री जगन्नाथ जी के दर्शन यहीं बैठे-बैठे हो गए l सन्तमत विचार- भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए स्वीकार है जो जीव मात्र की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए का कोई महत्व नहीं जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए...Iइस कहानी का सार ये है कि... भगवान को चढ़ावे की जरूरत नही होती है, *सच्चे मन से किसी जरूरतमंद की जरूरत को पूरा कर देना भी ..... भगवान को भेंट चढ़ाने से भी कहीं ज्यादा अच्छा होता है ..!!!*हम उस परमात्मा को क्या दे सकते हैं.....जिसके दर पर हम ही भिखारी हैं..

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